लखनऊ | उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने संगठन के भीतर अनुशासनहीनता के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है. बसपा सुप्रीमो ने अपने समधी व पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. अशोक सिद्धार्थ और पार्टी के वरिष्ठ कोऑर्डिनेटर रणधीर सिंह बेनीवाल को तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित कर दिया है. मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में अशोक सिद्धार्थ की पार्टी में किसी भी शर्त पर वापसी नहीं होगी. इस कठोर कार्रवाई के जरिए बसपा प्रमुख ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि पार्टी के हित और अनुशासन से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह पारिवारिक रूप से कितना भी करीब क्यों न हो.
अशोक सिद्धार्थ, जो वर्तमान में दक्षिणी राज्यों के पार्टी प्रभारी थे, पेशे से डॉक्टर हैं और 2008 में अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर बसपा में शामिल हुए थे. मायावती ने उन्हें 2009 में विधान परिषद सदस्य (MLC) और 2016 में राज्यसभा भेजा था. उल्लेखनीय है कि अशोक सिद्धार्थ की पुत्री डॉ. प्रज्ञा का विवाह मायावती के भतीजे आकाश आनंद से हुआ है. इससे पहले भी महाराष्ट्र चुनाव के दौरान टिकट वितरण में अनियमितता और प्रांतीय नेतृत्व से समन्वय न बनाने के कारण उन्हें निष्कासित किया जा चुका है. हालांकि, बाद में केवल दूसरे राज्यों में संगठन विस्तार की शर्त पर उन्हें पुनः शामिल किया गया था. हाल के दिनों में कर्नाटक, ओडिशा और पश्चिम बंगाल प्रभार के दौरान लगातार शिकायतें मिलने और चेतावनियों के बावजूद सुधार न होने पर शनिवार को उन्हें जिम्मेदारियों से मुक्त किया गया और फिर भ्रम की स्थितियों को विराम देने के लिए पूर्णतः निष्कासित कर दिया गया.
इसी क्रम में सहारनपुर निवासी कोऑर्डिनेटर रणधीर सिंह बेनीवाल पर भी पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में जिम्मेदारियों के दौरान पार्टी दिशा-निर्देशों के उल्लंघन के आरोप में गाज गिरी है. बेनीवाल के स्थान पर राज्यसभा सांसद रामजी गौतम को पुनः पंजाब का प्रभार सौंपा गया है. इसके साथ ही बसपा नेतृत्व ने एक नीतिगत फैसला लेते हुए यह तय किया है कि उत्तर प्रदेश के जो वरिष्ठ पदाधिकारी या कोऑर्डिनेटर वर्तमान में अन्य राज्यों का प्रभार संभाल रहे हैं, उन्हें यूपी के सांगठनिक कार्यों में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 31 जुलाई को आकाश आनंद की भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के बाद मायावती का यह कदम पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन और एकाधिकार बनाए रखने का प्रयास है. यूपी चुनाव से पहले यह साफ कर दिया गया है कि टिकट बंटवारे या सांगठनिक निर्णयों में अंतिम शब्द केवल बसपा प्रमुख का ही होगा. इस बीच, बसपा 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपने सामाजिक समीकरणों को भी साधने में जुट गई है. वर्ष 2007 के अपने ऐतिहासिक फॉर्मूले को दोहराते हुए मायावती ने ब्राह्मण समाज को पार्टी से जोड़ने के लिए अभियान तेज कर दिया है, ताकि विरोधी दलों की रणनीति को नाकाम कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई जा सके.
